देशभर में इन दिनों अतिक्रमण हटाने के अभियान तेज़ हैं। प्रशासन का तर्क स्पष्ट है कि सड़कें आम जनता के लिए हैं, फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए हैं और सार्वजनिक स्थानों पर अवैध कब्ज़ा नहीं होना चाहिए। कानून के शासन में इस सोच का स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन हर कार्रवाई के साथ एक ऐसा प्रश्न भी उठता है, जिसका उत्तर केवल बुलडोज़र या नोटिस से नहीं दिया जा सकता।
छोटे व्यापारियों की आजीविका का सवाल
आख़िर उन लाखों छोटे व्यापारियों का क्या होगा, जिनकी पूरी ज़िंदगी एक ठेले, रेहड़ी या छोटी-सी लारी पर टिकी हुई है?
देश के लगभग हर शहर और कस्बे में सुबह से रात तक मेहनत करने वाले ऐसे लोग मिल जाएंगे, जिनके लिए रोज़ कमाना ही रोज़ का भोजन है। वे किसी बड़े व्यवसायी की तरह पूंजी, संसाधन या प्रभाव नहीं रखते। उनकी सबसे बड़ी पूंजी उनका श्रम है। यदि वही एक ठेला या छोटी दुकान प्रशासनिक कार्रवाई में नष्ट हो जाए, तो उसके साथ केवल लकड़ी, लोहे या पहियों का ढांचा नहीं टूटता, बल्कि एक पूरे परिवार की आजीविका भी बिखर जाती है।
व्यवस्था और संवेदनशीलता साथ-साथ जरूरी
निस्संदेह, अवैध अतिक्रमण किसी भी शहर के विकास में बाधा बन सकता है। लेकिन एक संवेदनशील और उत्तरदायी शासन की पहचान केवल अतिक्रमण हटाने से नहीं होती, बल्कि उससे पहले पुनर्वास का रास्ता तैयार करने से होती है। यदि किसी की रोज़ी-रोटी हटानी पड़ रही है, तो उसके लिए सम्मानजनक विकल्प देना भी शासन की उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है।
विडंबना यह है कि कार्रवाई के दौरान अक्सर सबसे अधिक नुकसान समाज के उसी वर्ग को उठाना पड़ता है, जिसकी आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है। गरीब व्यापारी न तो लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकता है और न ही प्रभावशाली लोगों की तरह अपने हितों की रक्षा कर पाता है। परिणाम यह होता है कि व्यवस्था कायम रहती है, लेकिन उसके जीवन की व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ जाती है।
कानून का उद्देश्य संतुलन बनाना है
देश में स्ट्रीट वेंडर्स (जीविका संरक्षण एवं सड़क विक्रय विनियमन) अधिनियम, 2014 का उद्देश्य छोटे व्यापारियों के अधिकारों और शहरों की व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करना है। इस कानून की भावना केवल अतिक्रमण हटाना नहीं, बल्कि सर्वे, पहचान, वेंडिंग ज़ोन और पुनर्वास जैसी व्यवस्थाओं को लागू करना भी है। यदि इन प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो विवाद और टकराव दोनों कम हो सकते हैं।

वेंडिंग ज़ोन और पुनर्वास पर हो प्राथमिकता
समय की मांग है कि प्रत्येक नगर निकाय स्थायी वेंडिंग ज़ोन विकसित करे, छोटे व्यापारियों का नियमित सर्वे कर उन्हें वैध स्थान उपलब्ध कराए और किसी भी कार्रवाई से पहले पुनर्वास की स्पष्ट व्यवस्था सुनिश्चित करे। इससे शहर भी व्यवस्थित रहेंगे और लाखों परिवारों की आजीविका भी सुरक्षित रहेगी।
विकास का सही अर्थ
विकास केवल चौड़ी सड़कों, सुंदर चौराहों और आधुनिक इमारतों से नहीं मापा जाता। विकास तब सार्थक होता है, जब उसके साथ समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति भी सम्मानपूर्वक आगे बढ़ सके। यदि व्यवस्था बनाने की कीमत किसी गरीब के चूल्हे के बुझ जाने से चुकानी पड़े, तो उस व्यवस्था पर पुनर्विचार आवश्यक है।
एक लोकतांत्रिक और संवेदनशील समाज में कानून और करुणा, दोनों साथ-साथ चलने चाहिए। सरकार का उद्देश्य केवल अतिक्रमण हटाना नहीं, बल्कि आजीविका बचाना भी होना चाहिए। क्योंकि अंततः किसी भी राष्ट्र की ताकत उसकी अर्थव्यवस्था जितनी ही उसके मेहनतकश नागरिकों के सम्मान में भी छिपी होती है।
गरीबी हटाने का संकल्प स्वागतयोग्य है, लेकिन यह सुनिश्चित करना उससे भी अधिक आवश्यक है कि इस प्रक्रिया में गरीब ही न मिट जाए।


