गाजे-बाजे के साथ निकली घुड़लिया की शाही सवारी, ग्रामीणों ने किया स्वागत

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Ghudaliya's royal procession started with fanfare and was welcomed by the villagers
Ghudaliya's royal procession started with fanfare and was welcomed by the villagers

घुड़लिया – ऐतिहासिक युद्ध की याद का प्रतीक पर्व

बोरावड़ : शीतलाष्टमी के अवसर पर कस्बे के नया बाजार स्थित सुभाष पार्क से ग्राम पंचायत बोरावड़ के तत्वावधान में शुक्रवार रात 8:30 बजे परंपरागत रूप से घुड़लिया की सवारी गाजे-बाजे के साथ जुलूस के रूप में निकाली गई। इस दौरान घुड़लिया में शामिल महिलाओं को पंचायत की ओर से गुड़ वितरित किया गया।

गणमान्य लोगों ने दी सवारी को विदाई

समाजसेवी विजय सिंह राजपुरोहित, सत्यनारायण व्यास, नगरपालिका अध्यक्ष भंवरलाल मेघवाल सहित कई गणमान्य लोगों ने घुड़लिया की सवारी को रवाना किया। जुलूस गाजे-बाजे के साथ पारंपरिक लोकगीत “घुड़ल्यो घूमेला जी घूमेला…” गाते हुए नया बाजार, व्यास चैक होते हुए स्वर्ण कर मोहल्ला स्थित खाटूश्यामजी मंदिर तक पहुंचा, जहां इसका समापन हुआ।

सदियों पुरानी परंपरा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बड़े बुजुर्गों के अनुसार गणगौर पर्व सदियों से सांस्कृतिक उत्सव के रूप में उमंग और उत्साह से मनाया जाता है। यह जीवन मूल्यों की सुरक्षा एवं वैवाहिक जीवन की मजबूती के लिए एक प्रेरणादायक पर्व माना जाता है।

मारवाड़ में इस दिन एक ऐतिहासिक घटना भी घटी थी, जो “घुड़ला पर्व” के रूप में याद की जाती है। विक्रम संवत 1547 (सन 1490) में मांडू के सुल्तान नादिरशाह खिलजी के सूबेदार मल्लू खां ने मेड़ता पर आक्रमण करने के बाद पीपाड़ शहर में अपने सैनिकों के साथ डेरा डाल दिया था। इन सैनिकों ने वहां गणगौर पूजन कर रही कन्याओं को बंदी बना लिया।

मारवाड़ के वीरों का साहस और विजय

नारी शक्ति के अपमान को सहन न करते हुए मारवाड़ के शासक राव सातल, सूजा, वरसिंह और राव दूदा सहित अन्य वीर सैनिकों ने कोसाणा गांव में इस सैनिक छावनी पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में मल्लू खां परास्त होकर अजमेर भाग गया, लेकिन उसका सेनानायक घुड़ले खां सारंग खींची के हाथों मारा गया। घुड़ले खां को तीरों से बींध दिया गया और उसका सिर काटकर उन कन्याओं को सौंप दिया गया। कन्याओं ने उसका कटा हुआ सिर पूरे गांव में घुमाया।

घुड़लिया पर्व का प्रतीकात्मक महत्व

इस घटना की याद में आज भी मारवाड़ के गांवों में गणगौर के सोलह दिनों के दौरान घुड़लिया घुमाने की परंपरा कायम है। कन्याएं सिर पर छेद वाली मटकी में दीपक जलाकर रखती हैं, जो घुड़ले खां के तीरों से छिदे सिर का प्रतीक मानी जाती है। गली-मोहल्लों में इसे लेकर घूमते हुए लोकगीत “घुड़ल्यों घूमैला जी घूमैला…” गाया जाता है।

इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए राव सातल सहित अन्य योद्धाओं को कोसाणा गांव स्थित स्मारक पर श्रद्धांजलि दी जाती है।

कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य

इस अवसर पर विजय सिंह राजपुरोहित, सत्यनारायण व्यास, नगरपालिका चेयरमैन भंवरलाल मेघवाल, गजेन्द्र सिंह बोथरा, मनोहर सिंह राजपुरोहित सहित कई लोग मौजूद रहे।

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