हिंदी की अनिवार्यता पर राज ठाकरे का विरोध, महाराष्ट्र में नई शिक्षा नीति को लेकर विवाद

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मुंबई: महाराष्ट्र सरकार ने मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पहली से पांचवी कक्षा तक के छात्रों के लिए हिंदी को अनिवार्य तीसरी भाषा बनाने का आदेश जारी किया है। मंगलवार को जारी संशोधित सरकारी आदेश में कहा गया है कि हिंदी अनिवार्य होने के बजाय सामान्य रूप से तीसरी भाषा होगी, लेकिन किसी स्कूल में प्रति कक्षा 20 छात्र हिंदी के अलावा किसी अन्य भारतीय भाषा का अध्ययन करने की इच्छा व्यक्त करते हैं तो उन्हें इससे बाहर रहने का विकल्प दिया गया है।

राज ठाकरे ने जताई आपत्ति

मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने सरकार की नई शिक्षा नीति को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पहली से पांचवीं कक्षा तक के छात्रों को तीसरी भाषा सीखने के लिए मजबूर कर रही है। राज ठाकरे ने कहा, “हमें पहली और दूसरी कक्षा के छोटे बच्चों को तीन भाषाएं सीखने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। हमारे पास तीन भाषाएं, उनके विकल्प नहीं होने चाहिए। जब छठी कक्षा से अब तक तीसरी भाषा पढ़ाई जाती है तो पहली कक्षा से इसे मजबूर करने की क्या जरूरत है?”

शिक्षकों पर भी पड़ेगा बोझ

मनसे अध्यक्ष ने कहा, “महाराष्ट्र में मूल रूप से शिक्षकों की कमी है। आप शिक्षकों पर अधिक भाषाएं पढ़ाने का बोझ क्यों डाल रहे हैं? क्या राज्य सरकार यह नीति इसलिए ला रही है ताकि आईएएस अधिकारियों के लिए हिंदी बोलना आसान हो जाए और उन्हें मराठी बोलना और सीखना न पड़े? अगर यह सरकार मराठी है तो यह अनिवार्यता वापस ले ली जाएगी। मैं फिर से कहता हूँ, छोटे बच्चों को तीन भाषाएं सीखने के लिए मजबूर न करें।”

मुख्यमंत्री फडणवीस पर लगाए आरोप

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हवाला देते हुए तीसरी भाषा की अनिवार्यता का समर्थन करने पर राज ठाकरे ने कहा, “उस शिक्षा नीति में ऐसा कुछ नहीं है। उसमें तीसरी भाषा की अनिवार्यता का साधारण उल्लेख भी नहीं है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस झूठ बोल रहे हैं। इसके विपरीत केंद्र सरकार ने कहा है कि राज्य सरकार को वहां के स्थानीय मुद्दों पर विचार करके निर्णय लेना चाहिए, इसलिए इसमें केंद्र का कोई मुद्दा नहीं है। मुझे नहीं पता कि राज्य सरकार के इस निर्णय के पीछे क्या राजनीति है।”

मराठी भाषा पर खतरे की आशंका

राज ठाकरे ने कहा, “मैं राज्य के पत्रकारों और लेखकों से अनुरोध करता हूं कि वे इस फैसले के खिलाफ़ जोरदार तरीके से बोलें। यह मुद्दा हम पर थोपा गया तो ये लोग निकट भविष्य में मराठी भाषा को अस्तित्व में नहीं रहने देंगे। हमारा साहित्य खत्म हो जाएगा, हमारी संस्कृति खत्म हो जाएगी। मैं महाराष्ट्र के नागरिकों से इस फैसले का विरोध करने का अनुरोध करता हूं। हर स्कूल को सरकार के फैसले का विरोध करना चाहिए। मैं देख रहा हूं कि यह सरकार और स्कूल कैसे हिंदी पढ़ाते हैं। अगर सरकार को लगता है कि यह एक चुनौती है तो उन्हें इसे एक चुनौती के रूप में लेना चाहिए। हालांकि, राज्य में हिंदी को जबरन थोपने की अनुमति नहीं दी जाएगी।”

शिक्षा विभाग का स्पष्ट आदेश

महाराष्ट्र स्कूल शिक्षा विभाग ने मंगलवार को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत ‘स्कूली शिक्षा के लिए राज्य पाठ्यक्रम रूपरेखा 2024’ के कार्यान्वयन के तहत यह आदेश जारी किया। आदेश के अनुसार, मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पहली से पांचवी कक्षा तक के सभी छात्र अब अनिवार्य रूप से तीसरी भाषा के रूप में हिंदी का अध्ययन करेंगे। आदेश में कहा गया है, “जो छात्र हिंदी के विकल्प के रूप में कोई अन्य भाषा सीखना चाहते हैं, उनकी संख्या 20 से अधिक होनी चाहिए। ऐसी स्थिति में, उस विशेष भाषा के लिए एक शिक्षक उपलब्ध कराया जाएगा या भाषा को ऑनलाइन पढ़ाया जाएगा।”

विपक्ष ने भी उठाए सवाल

एक ओर मराठी भाषा के पक्षधरों ने आरोप लगाया है कि सरकार शुरू में इस नीति से पीछे हटने के बाद गुपचुप तरीके से इसे फिर से लागू कर रही है, तो वहीं कांग्रेस ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर मराठी लोगों की छाती में छुरा घोंपने का आरोप लगाया है।

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